बिहार में मेरी रेल यात्रा का एक अनोखा
अनुभव
घूमता आईना....डा. अकेलाभाइ
कुछ
बातें या सरकारी निर्णय को समझने में मुश्किल होता है। कुछ वर्षों पूर्व रेल का
आरक्षण टिकट एक माह पूर्व मिलता था। उसके बाद तीन माह पूर्व फिर चार माह पूर्व फिर
दो माह पूर्व और अब फिर 120 दिन पूर्व मिलने लगा है। बहुत कम ऐसे यात्री हैं जो
120 दिन पूर्व कहीं जाने की यात्रा तय कर लेते हैं। अब यह समझ में नहीं आता है कि
यदि रेल विभाग 60 दिन या 30 दिन पहले आरक्षण देने लगे तो क्या हानि होगी। 120 दिन पूर्व टिकट लेने के बाद अधिकांश
यात्रियों को टिकट रद्द कराना पड़ता है। रद्द करने पर काफी पैसा कट कर मिलता है।
इसलिए अधिकांश यात्रि तत्काल टिकट लेते हैं और अधिक किराया देते हैं। इससे रेल
विभाग को अच्छी आय होती है। रेल में सुविधाएं हो या न हों परंतु टिकट रद्द करने
तथा तत्काल टिकट कराने से रेल विभाग की आय में काफी वृद्धि हो गयी है। पहले यह सब
नहीं था। यदि एक महीना पहले से आरक्षण लेने का नियम बन जाये तो यात्रियों को काफी
लाभ मिल सकता है और वे बिना वजह टिकट रद्द कराने से बच जाएंगे। नेट, मोबाइल आदि की
सुविधा के जमाने में 120 दिन पहले आरक्षण कराने की बात मेरे समझ में नहीं आती है।
उस बार मैं भी 120 दिन पहले आरक्षण नहीं करा पाया था क्योंकि इतने दिन पहले यात्रा
करने का कार्यक्रम ही नहीं बना पाया था। जब यात्रा का कार्यक्रम निर्धारित हुआ तो
पता चला कि ए. सी. में एक भी सीट खाली नहीं है। और स्लीपर में 2 सीट खाली है। टिकट
ले लिया और यात्रा शुरू हुई। कटिहार तक सब कुछ ठीक ठाक रहा । बरौनी से आगे बढ़ने
पर स्लीपर कोच में लोकल और पासधारी यात्रियों की भीड़ बढ़ने लगी। एक सीट पर छः-सात
लोग धकिया कर बैठने लगे। कोच नम्बर 4 के एक आरक्षण टिकट रखने वाले यात्रि ने एक
युवक को बैठने नहीं दिया, क्योंकि पहले से ही उसके बर्थ पर चार लोग बैठे थे। उसके
साथ महिला यात्री थीं और एक बच्चा भी था। फिर क्या था उस युवक ने पहले उँगली
दिखाई, फिर हाथ ऊपर किया। जवाब में उस यात्री ने भी हाथ उठाया। भगवानपुर नामक
स्टेशन पर जब गाड़ी रुकी तो स्थानीय यात्री ने अपने जान पहचान के 10-12 यात्रियों
को बुला लाया और उस आरक्षित यात्री को मारने लगे। बस इतनी सी बात के लिए मामला तूल
पकड़ लिया। गाड़ी को एक घण्टे तक रोक कर रखा। फिर गाड़ी खुली। कोच 4 के सारे यात्री डर से उतर गये और कोच 3
और 5 में बैठ गये। 4 नम्बर कोच खाली होगया लेकिन वह यात्री उसी कोच में बैठा रहा।
गाड़ी खुली, स्टेशन के कुछ दूर चलने के बाद स्थानीय यात्रियों ने जंजीर खींचकर
गाड़ी को रोकवा दिया और उस यात्रि को नीचे उतारने लगे। उसे बचाने वाला कोई आगे
नहीं आ रहा था और सभी लोग उस यात्री को ही दोषी ठहरा रहे थे। भीड़ काफी जमा हो गयी
पास के गाँव के लोग भी बाँस और लाठी लेकर आगये अपने लोगों के बचाने के लिए।
गोरखपुर जाने वाला वह यात्री असहाय था। मारो...उतारो...की आवाजें आ रही थी। गाड़ी
काफी देऱ तक बीच पटरी पर रुकी रही। फिर पहले स्टेशन से कुछ रेल कर्मचारी आये।
युवकों को समझाया । गाड़ी चली। और अलगे स्टेशन पर तीन घण्टे देरी से पहुँची। सुनने
में आया कि इस तरह की घटनाएं प्रतिदिन हुआ करती है। स्लीपर कोच ही नहीं स्थानीय
यात्रि जो बिना टिकट के होते हैं या पासधारी होते हैं वे ए.सी. कोच में भी घुसकर
बैठ जाते हैं और दूसरे राज्यों से सफर कर रहे यात्रियों को तंग करते हैं। आश्चर्यजनक
बात तो यह है कि बिहार में जितनी दूरी तक गाड़ियाँ चलती हैं उतनी दूरी तक कोई
टीटीई आता ही नहीं है यदि आता भी है तो सभी यात्रियों का टिकट चेक नहीं करता है। दूसरी
विशेष और उल्लेखनीय बात यह है कि लगभग सभी गाड़ियाँ बिहार राज्य में घूसने के बाद
देर हो जाती हैं।
कुछ
दशक पूर्व रेल में टिकट चेकिंग खूब हुआ करती थी जिसके कारण यात्रियों को भय होता
था। आरक्षित डिब्बे में कोई भी यात्री साधारण टिकट लेकर नहीं बैठता था और साधारण
डिब्बे के यात्री भी सभी टिकट लेते थे। आज कई स्टेशन ऐसे जहाँ पर एक भी टिकट की
बिक्री नहीं होती है। जबकि चढ़ने वाले भी होते हैं और उतरने वाले भी। बातचीत करने
पर एक दैनिक यात्री ने कहा कि एक टीटीई पूरे ट्रेन की चेकिंग कैसे कर सकता है।
इसलिए यात्री इसका गलत फायदा उठाते हैं और रेलवे को घाटा होता है। अभी प्लेटफार्म
टिकट 10 रुपये का मिल रहा और सबसे कम का टिकट भी 10 रुपये का ही है। यदि ईमानदारी
से यात्री चलें तो इस विभाग को कभी नुकसान न उठाना पड़े। इंटरनेट आरक्षण के कारण
टिकट खिड़की पर काफी भीड़ कम हो गयी है, बहुत आसानी से आजकल टिकट मिल जाता है
लेकिन ट्रेन में खाली जगह हो तब न टिकट मिले। तत्काल टिकट तो 2 मिनट के बाद ही खतम
हो जाता है और आरक्षण टिकट 119 दिन पहले ही वेटिंग लिस्ट अधिकांश गाड़ियों में
दीखने लगता है। गाड़ियों की संख्या में में काफी वृद्धि हुई है लोकिन इसी अनुपात
में यात्रियों की संख्या भी बढ़ी है। सुविधाएं बढ़ी हैं तो समस्याएँ भी अधिक हुई
है। समस्याओं का अंत तो कभी नहीं हो सकता लेकिन कमी अवश्य किया जा सकता है। रेल
यात्रियों की बढ़ती समस्याओं पर अंकुश तो लगाया जा सकता है।
सीवान
स्टेशन पहुँचा। आज तो यह स्टेशन खूब चमक रहा था। सारे अधिकारी और कर्मचारी
साफ-सुथरे लिबास में दीख रहे थे। कोट और टाई में खूब आकर्षक लग रहे थे। सफाई
कर्मचारी हर 10-15 मिनट के बाद झाड़ू और
पोछा लगा रहे थे। प्रताक्षीलय तो खूब चमक रहा था। महिला प्रतीक्षालय में पर्दे लगे
थे। स्प्रे भी बार-बार छिड़का जा रहा था। मुझे कुछ समझ नहीं आया कि आज इस स्टेशन
के सभी कर्मचारी इतने सतर्क कैसे दीख रहे हैं। शौचालय में बाल्टी, मग, साबुन सभी
कुछ सलीके से रखा हुआ था। इससे पहले एक बार इसी सीवान स्टेशन पर आया था तो कुछ भी
ऐसा नहीं दीखा था। शौचालय के दीवारों पर यहां के अभद्र यात्रियों ने गंदी-गंदी
गालियाँ लिखी थी। जिसे मिटाने का प्रयास भी किया था परंतु उस समय तक दिखाई तो दे
ही रहा था। एक समुदाय ने दूसरे समुदाय के लिए तो दूसरे समुदाय ने पहले समुदाय के
लिए अश्लील शब्दों का प्रयोग किया था। मुझसे
रहा नहीं गया और एक अधिकारी से पूछ लिया तो पता चला कि डीआरएम साहब आने वाले हैं।
मुझे भी इतने बड़े अधिकारी से मिलने का मन किया। पर एक घण्टा हो गया अधिकारी महोदय
नहीं पहुंच पाये। सभी कर्मचारी एवं अधिकारी बार-बार अपनी घड़ी निहार रहे थे। और
लंच के लिए भी नहीं जा रहे थे कि पता नहीं कब साबह स स्टेशन पर पहुंच जाएं। तभी एक
डिब्बे वाला इंजन आता दिखाई दिया। सीढ़ी के पास वह इंजन रुका और साहब के साथ कई
अन्य अधिकारी और कर्मचारी भी नीचे उतरे। सब किसी के हाथ में एक-एक डायरी थी।
किसी-किसी के हाथ में नोट पैड था। साबह अच्छे सूट में बड़ी तन्मयता से चल रहे थे
और सब जगह का मुआयना कर रहे थे। साहब से मैंने मिलने की अनुमति यहाँ के स्टेशन
मास्टर से माँगी तो उन्होंने मना कर दिया। परंतु मैं भी इस काफिला में शामिल होकर
वहाँ की गततिविधियों को देखने लगा। पता नही क्यों महिला प्रतिक्षालय में दो बार
मुआयना हुआ। जहां पर सिर्फ एक ही महिला यात्री नकाब पहने बैठी थी। शायद इस प्रतीक्षालय
को और बेहतर बनाने के लिए डीआरएम साहब हिदायत दे रहे थे। लगभग आधे घण्टे के बाद मैं देख रहा हूँ कि
प्रतिक्षालय के पर्दे खुलने लगे और बाकी सब सजावट की चीजें भी हटा ली गयी क्योंकि
साहब अब सीवान स्टेशन से प्रस्थान कर चुके थे। आज मैं सोच रहा हूँ कि यह सारी
सुविधाएं रेल यात्रियों के लिए हैं या रेलवे अधिकारियों को दिखाने के लिए...........
--सचिव, पूर्वोत्तर हिंदी
अकादमी
पो. रिन्जा, शिलांग (मेघालय)
मोबाइल- 09436117260
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